Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verses 57–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 57,58
संस्कृत श्लोक
अवबुद्धा श्वपचता प्रतिभासवशात्त्वया ।
यथैवानल्पसंरम्भा विचित्राधिविकारदा ॥ ५७ ॥
तथैवातिथिरायातो भुक्तवान्सुप्तवान्द्विजः ।
कथां कथितवांश्चेति दृष्टवानसि संभ्रमम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार प्रचुर वेगवाली तथा विविध प्रकार के मानसिक चिन्तारूपी
विकार को पैदा करनेवाली चाण्डालता प्रतिभास के द्वारा (अज्ञान के द्वारा ) तुम्हें ज्ञात हुई है उसी तरह
एक ब्राह्मण अतिथि आया, उसने भोजन किया, वह सोया ओर उसने कथा करी" यह भी सब तुमने
भ्रमात्मक ही देखा है