Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
बहिर्न किंचिदप्यस्ति खाद्यब्ध्युर्वीदिगादिकम् ।
एतत्स्वचित्त एवास्ति पत्रपुञ्जमिवाङ्कुरे ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कहो है, तो मन में ही है बाहर कुछ नहीं है, ऐसा कहते है ।
आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी, दिशा आदि कुछ भी बाहर नहीं हे । ये सब अंकुर में पत्तों के समूह
की नाई अपने चित्त में ही हैं