Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 80
उन्नासीर्वौँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग पहले मन्त्री द्वारा उक्त राक्षसी के प्रश्नों का क्रम से और व्युत्क्रम से सूक्ष्म उपपत्तियों द्वारा यथायोग्य समाधान ।
52 verse-groups
- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अंधिरी रातमे महाअरण्य में महाराक्षसी के इस प्…
- Verses 3–4सम्पूर्ण प्रश्नो का खण्डन करने के लिए उनका पहले हृदय दिखलाते है । सोने के कमल के समान पील…
- Verses 5–6किस अणु के अन्दर लाखों ब्रह्माण्ड लीन होते हैं, इस प्रश्न का समाधान करते हैं। परम चिदणु क…
- Verse 7किमाकाशमनाकाशम्* इत्यादि प्रश्न का समाधान करते है । वही अनन्त चिदणु परमात्मा बाह्यशून्य…
- Verse 8कुछ होता हुआ भी यह दृश्य जिसके स्वरूपापन्न होने पर कुछ नहीं रहता वह क्या है ? ऐसा यदि प्र…
- Verse 9*कोडणु: तम:प्रकाश: स्यात् इत्यादि प्रश्नों में बार बार प्रयुक्त अणु” शब्द का भी वही अभिप…
- Verse 10“कौन अणु है और नहीं भी है“ इस प्रश्न मे उक्त नहीं है" अंश बाधित ही है, यों उक्त अंश को दू…
- Verse 11सत्पदार्थ का असत् से विरोध है, इससे भी उसे असत् कहना युक्त नहीं है, ऐसा कहते हैं। किसी…
- Verse 12कौन सब है और कुछ भी नहीं है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। चिन्मात्र वही अणु सब है । जो अप…
- Verse 13अथवा एक होते हुए भी अनेक संख्यावाले किसके अन्दर लाखों ब्रह्माण्ड लीन होते हैं, इस अभिप्रा…
- Verse 14जैसे जलराशि से ऊर्मियाँ (लहरें) पथक् नहीं हैं, वैसे ही किससे यह जगत् पृथक् नहीं है, इस…
- Verse 15देश, काल आदि से अनवच्छिन्न अद्वितीय असत् के सदश किस सत् से द्वैत भी अपुथक् है, इस शून्…
- Verse 16मैं अद्वैतज्ञान से आत्मस्वरूप ही होकर त्वदात्मा (आपका स्वरूप) हो गया हूँ ओर तुम भी आत्मस्…
- Verse 17त्वन्ता ओर अहन्तारूप सबका बोध से निगरण कर न तुम हो और न मैं हूँ और न सब है, अथवा वही स्वय…
- Verse 18चलता हुआ भी कौन नहीं चलता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । अणु होता हुआ भी आकाश की नाई ह…
- Verse 19कौन स्थित न रहता हुआ भी स्थित रहता है, इसका भी उत्तर उसी ढंग से देते हैं । गया हुआ भी यह…
- Verse 20गमन द्वारा प्राप्त होनेवाला देश जिसके शरीर के अन्दर ही स्थित है, वह कहाँ जाय ? क्या माता…
- Verses 21–22गम्य (गमन के योग्य) महादेश जिस सबके रचयिता के अन्दर स्थित है, यह कैसे कहाँ जाय ? जैसे जिस…
- Verse 23“कौन चेतन होता हुआ भी पाषाण है“ इस प्रश्न का यदि चेतनरूप और जड़रूप विरुद्ध दो रूपवाला कौन…
- Verse 24जब चेतन भी पाषाण के समान घनरूप कौन है, यह यदि प्रश्न का अर्थ हो, तब पारमार्थिक आत्मरूप चि…
- Verse 25आकाश में विचित्र चित्र बनानेवाला कौन है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । आदि और अन्त से रहि…
- Verse 26अग्निता का त्याग नहीं करता हुआ कौन अदाहक अग्नि है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। आत्मसत्ता…
- Verse 27किस अग्नि से अग्नि की उत्पत्ति होती है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। दैदीप्यमान उज्ज्वल आ…
- Verse 28चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि और तारों से भिन्न होता हुआ भी कौन अविनाशी प्रकाशक है ? इस प्रश्न क…
- Verses 29–30नेत्रों से नहीं गृहीत होनेवाले किससे प्रकाश प्राप्त होता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं…
- Verse 31लता गुल्म आदिका, जो कि जन्मान्ध हैं और अन्यान्य जीवो का भी कौन उत्तम आलोक है, इस प्रश्न क…
- Verses 32–34आकाश आदि का जनक कौन हे, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। काल, आकाश, क्रिया आदिकी सत्ता ओर जगत…
- Verse 35कौन जगद्रूपी रत्नों का कोश है, इसका उत्तर देते हैं। अपनी अणुता का त्याग न करता हुआ वह अणु…
- Verses 36–37कौन अणु दूर में है और समीपमें भी है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । इन्द्रियों से प्राप्त…
- Verse 38जो कि अणु है, इस अंश के तात्पर्य को स्फुट करते हैं। जो यह जगत् भासित होता है, वह चेतन का…
- Verse 39निमेष ही एक कल्प में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन क्रियाओं के विलास से युक्त प्रतीत होता है
- Verse 40जैसे कि मन में ही अनेक करोड़ों योजन में फैला हुआ नगर प्रतीत होता है। पूर्वोक्त अर्थ में अ…
- Verse 41जिस अत्यन्त सूक्ष्म अणुमें ही निमेष, कल्प, पर्वतसमूह और अनेक करोड़ योजन विद्यमान हैं, यान…
- Verse 42एक क्षण में ही मैंने इस कार्य को पहले किया था, यों कालदीर्घता का बुद्धि में स्फुरण होता ह…
- Verse 43इसमें लोकानुभव और आख्यायिका का उदाहण देते हैं । दुःख में काल दीर्घ प्रतीत होता है और सुख…
- Verse 44चित्तवृत्ति के अनुसार ही चित् की प्रतीति होती है, वस्तु के स्वभाव के अनुसार नहीं, ऐसा कह…
- Verse 45तो वास्तविक तत्त्व क्या है 2 इस पर कहते हैँ । न निमेष है, न कल्प है, न सामीप्य (नजदीकी) ह…
- Verse 46इस प्रकार और पदार्थ भी नहीं है, क्योकि विरुद्ध पदार्थो मे अधिष्ठानभूत चित् का भेद न होने…
- Verse 47कौन प्रत्यक्ष है ओर असद्भूप है, इस प्रश्न उत्तर कहते हैं। इन्द्रियों का सार यानी अपने कर्…
- Verse 48यदि वही दृश्यस्वरूप है, तो दृश्य हेय है, ऐसा कैसे कहते हो ? इस शंका पर कहते है । जब तक कट…
- Verse 49अतएव दृश्यरूप से उसकी कल्पना न करने पर और कल्पना करके भी दृश्यरूप से न देखने पर दृश्य के…
- Verse 50-असद्रूप कौन है इस प्रश्नांश का तात्पर्य कहते है । सर्वात्मक होने के कारण ही वह सद्रूप है…
- Verses 51–52उसमें विषय के अभाव का ही उपपादन करते हैं । चित् स्फुरणमात्र ही जिसका स्वरूप है, चित्प्रत…
- Verse 53सूर्य की किरणों से आगे कहे जानेवाले कोचिन आदि का जो सूक्ष्मतर निर्माण निर्विघ्नता से होता…
- Verses 54–55माया से जैसे सूर्य-किरणों के लेश से युक्त आकाश में स्वर्णं स्फुरित होता हे, वैसे ही यह जग…
- Verse 56जगत् इस प्रकार भ्रान्तिसिद्ध हो, उससे क्या ? इस पर कहते है । इस प्रकार के जगत् के मिथ्य…
- Verse 57अथवा विषयरूप भेदक के ज्ञान से ही आत्मा विभिन्न-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः भिन्न नहीं है,…
- Verse 58यदि भेद नहीं है, तो धरती आदि की भेदप्रतीति कैसे होती है, इस पर कहते हैं । जैसे कि प्रभापि…
- Verse 59इस प्रकार युक्तिपूर्वक प्रसंगप्राप्त (कि चेतनमचेतनम्” इस प्रश्न का उत्तर देकर शेष प्रश्न…
- Verse 60चृक्षात्मबीजवत्* इस दृष्टान्त का विवरण करते हुए (कोऽन्तर्बीजमिवाऽन्तस्थं स्थितः कृत्वा त…
- Verse 61(आकाशकोशवत् इस कथन का तात्पर्य कहते है । जैसे बीज के भीतर स्थित वृक्ष की, अतिसूक्ष्म होन…
- Verse 62इसीसे सव प्रश्नों का उत्तर प्रायः हो गया, ऐसा सूचित करते हुए सव प्रश्नों की परमतात्पर्या-…