Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
दुर्बोधत्वात्तमः सोऽणुश्चिन्मात्रत्वात्प्रकाशदृक् ।
सोऽस्ति संवित्तिरूपत्वादक्षातीतस्तथा न सन् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
कौन जगद्रूपी रत्नों का कोश है, इसका उत्तर देते हैं।
अपनी अणुता का त्याग न करता हुआ वह अणु जगद्रूप रत्नों का भंडार है।
किस मणिका कोश यह जगत् है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं ।
प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदिरूप जगत् अद्वितीय ब्रह्म में नहीं है, इसलिए सम्पूर्ण जगत् में
सर्वत्र वही केवल भली भाँति स्फुरित होता है, ऐसी अवस्था में इस जगद्रूपी पिटारीमें वह
परममणि स्थित है ॥३३, ३ ४॥
कौन अणु तम और प्रकाश है, इसका उत्तर देते हैं -
दुर्बोध होने के कारण वह अणु तम है और चिन्मात्र होने के कारण प्रकाश-स्वरूप है । अब
कौन अणु है और नहीं है, इस पर कहते हैं । ज्ञानरूप होने के कारण वह सत् है और इन्द्रियातीत
है, अतः असत् है