Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 51–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 51,52
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कारमात्रात्मन्यस्मिंश्चित्प्रतिभात्मनि ।
जगत्यनिलवृक्षाभे चिच्चेत्यकलने कुतः ॥ ५१ ॥
यथा तापस्य पीनस्य भासनं मृगतृष्णिका ।
एवं पीवरमद्वैतं तथा चिद्भासनं जगत् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें विषय के अभाव का ही उपपादन करते हैं ।
चित् स्फुरणमात्र ही जिसका स्वरूप है, चित्प्रतिभा स्वरूप वायु से कँपाये गये वृक्षके
समान अत्यन्त अस्थिर (या वृक्षाकार विद्युत् के समान अत्यन्त असत्) इस जगत् में चैतन्य
की आश्रयता ओर विषयता केसे ? जैसे प्रचुर ताप का भासन मृगतृष्णा है, वैसे ही प्रचुर
अद्वैतरूप चित् का स्फुरण यह जगत् है