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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

चित्तेन्द्रियाद्यलभ्यत्वात्सोऽणुः शून्यस्वरूपवत् । स्वसंवेदनलभ्यत्वादशून्यं व्योमरूप्यपि ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

देश, काल आदि से अनवच्छिन्न अद्वितीय असत्‌ के सदश किस सत्‌ से द्वैत भी अपुथक्‌ है, इस शून्यात्मक और अशून्यात्मक उक्ति का तात्पर्य कहते हैं । चित्त, इन्द्रिय आदि से लभ्य न होने के कारण वह अणु शून्यस्वरूप के (असत्‌ के) तुल्य है, व्योमरूपी होता हुआ भी स्वानुभवलभ्य होने से अशून्य (सत्‌) है