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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

निमेषजठरे कल्पसंभवः समुदेति हि । महानगरनिर्माणं मुकुरेऽन्तरिवामले ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कि मन में ही अनेक करोड़ों योजन में फैला हुआ नगर प्रतीत होता है। पूर्वोक्त अर्थ में असंभावना की निवृत्ति के लिए दूसरा दृष्टान्त देते हैं । निमेष के अन्दर कल्प का उदय होता है, जैसे कि अत्यन्त निर्मल दर्पण के अन्दर बड़े भारी नगरका आविर्भाव होता है