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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

सर्वात्मकत्वाद्भुक्ते च तेन किंचिन्न किंचन । चिदणोः प्रतिभा सा स्यादेकस्यानेकतोदिता । असत्येव यथा हेम्नः कटकादि तथा परे ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ होता हुआ भी यह दृश्य जिसके स्वरूपापन्न होने पर कुछ नहीं रहता वह क्या है ? ऐसा यदि प्रश्न का आशय माना जाय, तो उस पर कहते हैं। सर्वात्मक होने से साक्षात्‌ किये गये अपने स्वरूप से ही सब जीवों के निगीर्ण (लय) होने पर वही कुछ न कुछ रह जाता है यानी आत्मा से अतिरिक्त कुछ अवशिष्ट नहीं रहता। एक की जो अनेकता उदित होती है, वह प्रातीतिक है, वास्तविक नहीं है, इससे एक होता हुआ अनेक कौन है, इसका उत्तर हो गया । जैसे सुवर्ण ने विक्षेपशक्ति से कटक आदि को प्रकट किया है, वैसे ही उसी चिदणुने द्रष्टा, दर्शन आदि को विक्षेपशक्ति से प्रकट किया है, इससे 'कटकादीनि हेम्नेव” इस प्रश्न का उत्तर भी हो गया