Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
अनेत्रलभ्योऽनुभवरूपो हृद्गृहदीपकः ।
सर्वसत्ताप्रदोऽनन्तः प्रकाशः परमः स्मृतः ॥ २९ ॥
प्रवर्ततेऽस्मदालोको मनःषष्ठेन्द्रियातिगात् ।
येनान्तरापि वस्तूनां दृष्टा दृश्यचमत्कृतिः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
नेत्रों से नहीं गृहीत होनेवाले किससे प्रकाश प्राप्त होता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं ।
नेत्रो से नहीं प्राप्त होनेवाला ओर अनुभवरूप, हृदयरूपी घर को प्रदीप्त करनेवाला,
सबको सत्ता देनेवाला जो अनन्त परमप्रकाश कहा गया है, उससे प्रकाश प्राप्त होता हे । हम
लोगों का प्रकाश (अहंकार आदि का प्रथन) मन ओर पचो ज्ञानेन्द्रिय के अविषय आत्मा से
प्रवृत्त होता हे । जैसे कि गाढ़ अन्धकार में स्थित पुरुष भी "तुम कहाँ हो", यह पूछने पर मेँ यहाँ
पर हूँ“, ऐसा कहता हे । जिस प्रकाशक से आलोक, दीप आदि के बिना भी देह, इन्द्रिय आदि
की अपरोक्ष प्रतीति सवनुभवसिद्ध है