Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महानिशि महारण्ये महाराक्षसकन्यया ।
इति प्रोक्ते महाप्रश्ने महामन्त्री गिरं ददौ ॥ १ ॥
मन्त्र्युवाच ।
शृणु तोयदसंकाशे प्रश्नमेतं भिनद्मि ते ।
अनुक्रमात्मकं मत्तं गजेन्द्रमिव केसरी ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अंधिरी रातमे महाअरण्य में महाराक्षसी के
इस प्रकार अनेक प्रश्न करनेपर आगे कहे जानेवाली रीति से महामंत्री ने उत्तर दिया मंत्री ने
कहा : हे मेघतुल्य राक्षसी, जैसे सिंह मदोन्मत्त हाथी को छिन्नभिन्न करता हे, वैसे ही मैं
तुम्हारे अनुक्रमरूप प्रश्नोको युक्तियों द्वारा छिन्न-भिन्न करता हूँ
सर्ग सन्दर्भ
उन्नासीर्वौँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग पहले मन्त्री द्वारा उक्त राक्षसी के प्रश्नों का क्रम से और व्युत्क्रम से सूक्ष्म उपपत्तियों द्वारा यथायोग्य समाधान ।