Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
दूरे सोऽनक्षलभ्यत्वाच्चिदूपत्वान्न दूरगः ।
सर्वसंवेदनाच्छैलो ह्यसावेवाणुरेव सन् ॥ ३६ ॥
तत्संवेदनमात्रं यत्तदिदं भासते जगत् ।
न सत्यमस्ति शैलादि तेनाणावेव मेरुता ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
कौन अणु दूर में है और समीपमें भी है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं ।
इन्द्रियों से प्राप्त न होने के कारण वह दूर में हे, चैतन्यरूप होने के कारण दूर नहीं है यानी
समीप में हे । कौन अणु होता हुआ ही महापर्वत है, इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं । करणों के
बिना ही सभी लोगों को “अहम्, अहम् इस प्रकार सामने स्थित पर्वत के समान अपरोक्षरूप
से उसका ज्ञान होता है, अत: इसीको, जो कि अणु है, तुमने पर्वत कहा है