Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
तथा चैवंविधन्यायभावनाभ्यासनिर्मलात् ।
चिदाकाशेन निर्याति यथा भूतार्थदर्शिनः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् इस प्रकार भ्रान्तिसिद्ध हो, उससे क्या ? इस पर कहते है ।
इस प्रकार के जगत् के मिथ्यात्व के उपपादक न्यायो की पुनः पुनः भावना करनारूप
अभ्याससे निर्मल हुए मन से पारमार्थिक वस्तु ब्रह्म का दर्शन कर चुके पुरुष की अविद्याका
नाश होने पर चिदाकाश में फिर संसार प्रविष्ट नहीं होता यानी उसकी पुनरावृत्ति नहीं
होती