Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

भवत्या परमात्मैष कथितः कमलेक्षणे । अनयैव वचोभङ्ग्या प्रश्नविद्बोधयोग्यया ॥ ३ ॥ अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः । चिन्मात्रमेवमात्माणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण प्रश्नो का खण्डन करने के लिए उनका पहले हृदय दिखलाते है । सोने के कमल के समान पीले नेत्रवाली हे राक्षसी, तुमने प्रश्न जाननेवाले के समझने योग्य इन वचनो से परमात्मा का ही प्रतिपादन किया हे । नामरहित होने के कारण तथा आभ्यन्तर और बाह्य मन, चक्षु, श्रोत्र आदि छः ज्ञानेन्द्रिय का अविषय होने के कारण आकाश से भी सूक्ष्म चिन्मात्र आत्मा का ही तुमसे अणुशब्द से व्यवहार किया हे । इसमें “कस्याडणोरम्बुधे:” इस प्रश्न में स्थित अणु शब्द का अभिप्राय खोला गया है