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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

गम्यो यस्य महादेशो यावत्संभवमक्षयः । अन्तस्थः सर्वकर्तुर्हिं स कथं क्वेव गच्छति ॥ २१ ॥ यथा देशान्तरप्राप्ते कुम्भे वक्त्रसमुद्रिते । तदाकाशस्य गमनागमने न तथात्मनः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

गम्य (गमन के योग्य) महादेश जिस सबके रचयिता के अन्दर स्थित है, यह कैसे कहाँ जाय ? जैसे जिसका मुँह बँधा है, ऐसे घड़े को अन्य देश में ले जाने पर उसमें स्थित आकाश के गमन और आगमन नहीं होते, वैसे ही उपाधि के गमन और आगमन से आत्मा के गमन और आगमन नहीं हो सकते