Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
चित्तता स्थाणुता स्वान्तर्यदा स्तोऽनुभवात्मिके ।
चेतनस्य जडस्यैव तदासौ द्वयमेव च ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
“कौन चेतन होता हुआ भी पाषाण है“ इस प्रश्न का यदि चेतनरूप और जड़रूप विरुद्ध दो
रूपवाला कौन है यह अर्थ हो, तो उत्तर देते हैं।
स्वभावतः जड़ एवं आत्मतादात्म्याध्याससे चेतन बने हुए देह आदि में प्रकाशस्वभावता
और जड़ता अनुभव-सिद्ध है, अज्ञान से उसका विवेक न होने के कारण वह जड़ और बोध
उभयरूपवाला होता ही है