Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
सर्वत्वादेव सद्रूपो दुर्लक्ष्यत्वादसद्वपुः ।
चेतनश्चेतनात्मत्वाच्चेत्यासंभवतस्त्वचित् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
-असद्रूप कौन है इस प्रश्नांश का तात्पर्य कहते है ।
सर्वात्मक होने के कारण ही वह सद्रूप है यानी सर्वानुगत सद्रूप से उसकी प्रतीति होती है,
अतः वह सद्रूप है । उसका दर्शन पृथक्रूप से हो ही नहीं सकता, अतः वह अस्द्रूप हे ।
“असद्भा इदमग्र आसीत्" इस श्रुति में ऐसा व्यवहार देखा जाता है । "किं चेतनमचेतनम्' इस
प्रश्न का उत्तर कहते हैं । चित्स्वरूप होने के कारण वह चेतन हे, उसमे विषयरूप का संभव न
होने से भी विषयरूप से वह प्रतीत होता है, अतः तुमने उसको अचित् कहा हे