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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

प्रतिभासाच्चिदाकाशे सत्त्वशून्यं भवन्ति ताः । प्रकचन्ति ह्यनिर्भाव्याः प्रभापिण्ड इव प्रभाः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि भेद नहीं है, तो धरती आदि की भेदप्रतीति कैसे होती है, इस पर कहते हैं । जैसे कि प्रभापिण्ड में यौक्तिक दृष्टि से अनिर्वचनीय प्रभाएँ स्फुरित होती हैं वैसे ही चिदाकाश में वे पूर्वोक्त भेदप्रतीतियाँ सत्ता के बिना ही प्रतीत होती है