Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 54
तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ सर्ग सब पदार्थो की नियति, मरणक्रम, भोग और कर्म, गुण एवं आचार के अनुसार आयु के मान का वर्णन ।
54 verse-groups
- Verse 1श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, इसलिए जो लोग तत्त्वज्ञानी हैं अथवा जिन लोगों ने योग के अभ्यास…
- Verse 2यदि कोई शंका करे कि आतिवाहिक ब्रह्मादि के लोकों में भी यहॉकी नाई चिरकाल के अभ्यास आदि से…
- Verse 3अवलम्बन किया था, इसलिए वह केवल पति के कल्पित नगर में गई
- Verse 4देवी के उक्त कथन को स्वीकार कर राजा की मृत्यु देखने से सूचित जीवन के नियम ओर अनियम की अनु…
- Verse 5यहाँ पर प्रश्न का इस समय मुझे क्या करना चाहिए ।* ऐसा अभिप्राय नहीं है क्योकि ऐसा मानने से…
- Verses 6–8यदि कोड कहे कि नियम न हो, अनियम ही रहे, तो इस पर कहते है । यदि अनियम मानोगे, तो जल का शीत…
- Verses 9–10सभी जगह ऐसा ही नियम होता, यदि जगत केवल सत्य स्वभाव होता ओर सभी जगह अनियम ही होता, यदि जगत…
- Verse 11वह तेज का कणरूप ब्रह्म अपने से अपने में स्थूलता को प्राप्त करता हे यानी अपनी कल्पना से स्…
- Verse 12उक्त ब्रह्माण्ड के भीतर स्थित हिरण्यगर्भनामक ब्रह्म 'सहसिद्धं चतुष्टयम्" इस पूर्वोक्त स्…
- Verse 13उस पहली सृष्टि में जो संकल्पवृत्तियाँ जहाँ पर जैसे (नियम- अनियमरूपसे) विकास को प्राप्त हु…
- Verse 14भाँति- भाँति की वासनाओं से भरे हुए मन मे, वैसा संकल्पोदय होने पर भी आत्म-चैतन्य का मन के…
- Verse 15मायाशबल ब्रह्म मे अनादिकाल से नियतरूप से स्थित विश्व के आविभवि से भी (नियति की सिद्धि होत…
- Verse 16सृष्टि के आरम्भ में स्वयं ही आत्मचैतन्य जैसे अपनी सत्ता से (शीतलता, उष्णता आदिरूप से) अपन…
- Verse 17यदि मायाशबल ब्रह्म अपनी अधिष्ठान सत्ता का त्याग करेगा, तो मायान्तर्गत नियमों की असत्ता हो…
- Verse 18नियति के अविपयसि में (उलटफेर न होने में) पृथ्वी आदि की स्थिति ही दृष्टान्त है, इस आशय से…
- Verse 19जीवननियति का मरणनियति से जो विपयसि है, उसके सभी को दिखाई देने से कहती है । जीवननियम का मर…
- Verse 20ऊपर जो कुछ कहा गया है, वह मायिक दुष्टि का अवलम्बन करके कहा गया है परमार्थ दृष्टि से तो जब…
- Verse 21इस प्रकार असत्य होता हुआ भी सत्य के तुल्य प्रतीत होनेवाला यह प्रातिभासिक जगत् स्थित है,…
- Verse 22नियति शब्द के अवयवार्थपर ध्यानपूर्वक विचार करने से भी यही अर्थ सिद्ध होता है, ऐसा कहती है…
- Verses 23–25उक्त अर्थ को ही उदाहरण देकर दर्शाती है । सृष्टि के आरम्भ में चिदाकाश, जिसने आकाशरूप से स्…
- Verse 26जैसे स्वप्न, संकल्प और ध्यान में असत् वस्तु को ही अन्तःकरण अपनी कल्पना से जानता है, वैसे…
- Verse 27इस प्रकार अन्य नियमो की व्यवस्था करके जीवननियति भी कर्मो के भेद से नियत अवधिवाली ही इश्वर…
- Verse 28पहली सृष्टि में सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग में पुरुषों की क्रमश: चार सौ, तीन सौ, दो स…
- Verse 29आयु के निमित्तभूत अपने कर्मों की देश, काल, अनुष्ठान और द्रव्य की अशुद्धि और शुद्धि तथा न्…
- Verse 30इसी प्रकार विहित कर्मो का अनुष्ठान न करना भी आयु के हास का कारण है, ऐसा कहती हैं । अपने क…
- Verse 31विहित का आचरण न करने के समान निषिद्ध का आचरण करना भी आयु के ह्वास का हेतु है, ऐसा कहती है…
- Verse 32जो पुरुष शास्त्र में जैसा कहा गया है, उसका उल्लंघन किये विना आरम्भ किये गये अपने धर्म का…
- Verse 33इस प्रकार अपने कर्मो के अनुसार जीव अन्त्य दशा को प्राप्त होता है, आयु की समाप्ति को प्राप…
- Verse 34प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे चन्द्रमुखी देवि, मुञ्जसे आप संक्षेप से मरण का वृत्तान्त कहिये,…
- Verses 35–37श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, मुमूर्षु (मरने के इच्छुक) पुरुष तीन प्रकार के होते हँ -मूर्ख,…
- Verses 38–40वासना के आवेशवश पराधीनचित्त हुआ अतएव विषयों का ही चिन्तन करनेवाला पुरुष कटे हुए कमल की ना…
- Verses 41–50वह परम अन्धकार को प्राप्त होकर प्रकाश से वंचित रहता है, क्योकि दिन में उसके लिए तारे उगे…
- Verse 51जैसे सूर्य के अस्त होने पर मन्द-मन्द प्रकाशवाली दिशाएँ काली हो जाती हैं, वैसे ही उसकी सम्…
- Verse 52जैसे पश्चिम सन्ध्या के (सायंकाल की सन्ध्या के) बाद नष्ट हुई नेत्रशक्ति आठों दिशाओं में पू…
- Verse 53उसका मन मोह होने के कारण कल्पना शक्ति का त्याग करता है, इसलिए अविवेकवश महामोह में गिरता है
- Verse 54जब देही अल्प मूर्च्छा को प्राप्त होता है, तब उसके प्राण अंग-प्रत्यंगों को नहीं थामते जब व…
- Verses 55–56मोह यानी अपने स्वरूप का परिचय न रहना, संवेदन यानी विषयवासनाएँ ओर भ्रम यानी अन्यथा ज्ञान य…
- Verse 57श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे ! ईश्वर ने, जिनमें क्रियाशक्ति की प्रधानता है, इस प्रकार संकल्प…
- Verse 58“वह मुझे प्राप्त हो" इस अपने संकल्प के स्वभाव से उत्पन्न दुःख को स्वयं ही जीवरूप से देहाद…
- Verse 59जब नाडियाँ पीडावश हुए संकोच-विकास से खाये ओर पीये गये पदार्थो के रस को विषमता के साथ ग्रह…
- Verse 60जब नाड़ियों में प्रविष्ट वायु बाहर नहीं आते ओर बाहर निकले हुए वायु उनमें प्रवेश नहीं करते…
- Verse 61जब वायु न तो प्रवेश ही करता है ओर न बाहर ही निकलता है, तब शरीर की नाडियों से शून्य हो जान…
- Verse 62मुझे इतने काल में नाश को प्राप्त होना चाहिये इस प्रकार की पूर्वजन्म के संकल्प से युक्त ओर…
- Verse 63यदि कोई कहे कि उक्त नियति का नाश होने पर जगत् के व्यवहार का ही भग हो जायेगा । इस पर कहती…
- Verse 64अविद्यायुक्त जीवचैतन्य के स्वरूप का विचार करने पर भी यही प्रतीत होता है कि जबतक मोक्ष न ह…
- Verse 65सांसारिक जीव के संवित् प्रवाह का वर्णन करते हैं । जैसे नदी में जल कभी आवर्तयुक्त यानी अस…
- Verse 66जैसे लम्बी दूब आदि की लताओं के बीच- बीच में गाँठें होती हैं, वैसे ही चेतनसत्ता के मध्य मे…
- Verse 67ऊपर जिसका वर्णन किया हे, वह सब भ्रान्तदुष्टि है, परमार्थदृष्टि तो यह है कि चेतन पुरुष न त…
- Verse 68चेतन की अमरणस्वभावता का युक्ति से उपपादन करते हैं। चेतनामात्र ही तो पुरुष हे, वह कब और कह…
- Verse 69चेतन का मरण सिद्ध नहीं हो सकता, जिसने चेतन का मरण देखा हो, ऐसा कोई साक्षी ही नहीं है, फिर…
- Verse 70यदि चेतन की मृत्यु हुई तो बड़ा भारी अनर्थ प्राप्त होगा, यों दर्शाते हुए चेतन की मृत्यु का…
- Verse 71यदि कोई पूछे तब जन्म-मरण, जिनका सबको अनुभव होता है, क्या है यानी उनका स्वरूप क्या है 2 इस…
- Verses 72–73इस प्रकार न तो कोई मरता है और न कोई पैदा होता है। केवल जीव अपनी वासनारूपी जलभौरी के गड्ढे…
- Verse 74दृश्य का सर्वथा असंभव होने से यह वासना है ही नहीं, इस प्रकार के विचार से दृढ़ (मजबूत) ज्ञ…