Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
अमरिष्यन्न वै चित्तमेकस्मिन्नेव तन्मृते ।
अभविष्यत्सर्वभावमृतिरेकमृताविह ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि चेतन की मृत्यु हुई तो बड़ा भारी अनर्थ प्राप्त होगा, यों दर्शाते हुए चेतन की मृत्यु का
खंडन करते हैँ ।
प्रत्येक देह में भिन्न-भिन्न चेतन हैं, इसमें कोई प्रमाण नहीं है, प्रत्युत “एको देवः सर्वभूतेषु
गूढः” इस श्रुतिरूप प्रमाण से सब देहो में एक ही चेतन है, वह सिद्ध होता है । वह एक चेतन यदि
मर जाय, तो समष्टि ओर व्यष्टि का चित्त, जिसकी सत्ता ओर स्फूर्ति उसीके अधीन हे, कैसे
नहीं मरेगा ? यानी अवश्य मर जायेगा । समष्टि ओर व्यष्टि के चित्त के मर जाने पर चित्तमात्ररूप
जगत् की उपादानशून्य सत्ता नहीं रह सकती । इसलिए एक के मरने पर यहाँ सब भूतो की
मृत्युरुप दोष अनिष्ट नहीं होगा क्या ?