Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
स्यान्मे इत्येव संविश्य गुल्मवत्तत्स्वभावजम् ।
वेत्ति चित्तविजृम्भोत्थं नान्यदत्रास्ति कारणम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
“वह मुझे प्राप्त हो" इस अपने
संकल्प के स्वभाव से उत्पन्न दुःख को स्वयं ही जीवरूप से देहादि उपाधि में अपने चित्त
के स्वभाव से कल्पित वृक्षों के झुरमुट की नाई प्रवेशकर उसका भोग करता हे । उसके
दुःखभोग में दूसरा कारण नहीं हे