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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 38–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verses 38–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 38-40

संस्कृत श्लोक

वासनावेशवैवश्यं भावयन्विषयाशयः । दीनतां परमामेति परिलूनमिवाम्बुजम् ॥ ३८ ॥ अशास्त्रसंस्कृतमतिरसज्जनपरायणः । मृतावनुभवत्यन्तर्दाहमग्नाविव च्युतः ॥ ३९ ॥ यदा घर्घरकण्ठत्वं वैरूप्यं दृष्टिवर्णजम् । गच्छत्येषोऽविवेकात्मा तदा भवति दीनधीः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

वासना के आवेशवश पराधीनचित्त हुआ अतएव विषयों का ही चिन्तन करनेवाला पुरुष कटे हुए कमल की नाई अत्यंत दीनता को प्राप्त होता हे, जिसकी बुद्धि शास्त्रों से संस्कृत नहीं है और जो असज्जनों की संगति करता हे, वह मरने पर अग्नि में गिरे हुए पुरुष की नाई अन्तर्दाह का अनुभव करता है । उस अविवेकी का कण्ठ जव कफ से “घर, घर” शब्द करता है ओर दृष्टि तथा वर्ण विरूप हो जाते हैं, तब वह बड़ा दयनीय होता हे