Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
आधिभौतिकदेहत्वं मिथ्याभ्रममयात्मकम् ।
कथं सत्ये स्थितिं याति च्छायास्ते कथमातपे ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि आतिवाहिक ब्रह्मादि के लोकों में भी यहॉकी नाई चिरकाल के
अभ्यास आदि से भौतिक देहता का उदय क्यो नहीं होता ? तो इस पर कहती हैं।
आधिभौतिकदेहता मिथ्या (भ्रमरूप) है, वह स्थूल की अपेक्षा सत्य (२) यानी पुण्य के
उत्कर्ष से प्राप्त आतिवाहिकरूप सत्य में कैसे स्थिति को प्राप्त हो सकती है ? छाया धूप में
कैसे रह सकती है ? भाव यह कि जैसे धूप में छाया की स्थिति नहीं हो सकती, वैसे ही
आतिवाहिकरूप सत्य में आधिभौतिक देहता नहीं रह सकती