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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 74

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 74

संस्कृत श्लोक

अनुदितमुदितं जगत्प्रबन्धं भवभयतोऽभ्यसनैर्विलोक्य सम्यक् । अलमनुदितवासनो हि जीवो भवति विमुक्त इतीह सत्यवस्तु ॥ ७४ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य का सर्वथा असंभव होने से यह वासना है ही नहीं, इस प्रकार के विचार से दृढ़ (मजबूत) ज्ञाता (अन्तःकरण) अवश्य नष्ट हो जाता है ॥७ ३॥ वैराग्य आदि साधनों से सम्पन्न अधिकारी जीव गुरुमुख से श्रवण आदिके अभ्यास से प्रतीत हो रहे जगत्‌-प्रपंच को यह परमार्थरूप से उदित नहीं हुआ है, यों तत्त्वज्ञान से देख कर मूल के (अज्ञान के) कटने से सर्वथा द्वैतवासना से शून्य होकर विमुक्त हो जाता है, यों विमुक्त आत्मस्वरूप ही यहाँ परमार्थ वस्तु हे, उससे अतिरिक्त सब असत्‌ है