Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 35–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 35-37
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
त्रिविधाः पुरुषाः सन्ति देहस्यान्ते मुमूर्षवः ।
मूर्खोऽथ धारणाभ्यासी युक्तिमान्पुरुषस्तथा ॥ ३५ ॥
अभ्यस्य धारणानिष्ठो देहं त्यक्त्वा यथासुखम् ।
प्रयाति धारणाभ्यासी युक्तियुक्तस्तथैव च ॥ ३६ ॥
धारणा यस्य नाभ्यासं प्राप्ता नैव च युक्तिमान् ।
मूर्खः स्वमृतिकालेऽसौ दुःखमेत्यवशाशयः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, मुमूर्षु
(मरने के इच्छुक) पुरुष तीन प्रकार के होते हँ -मूर्ख, धारणा का (नाभि में, हृदयमें,
कण्ठमें, भौंहों के बीचमें ओर ब्रह्मरन्ध्र मे नियत अवधि तक प्राण ओर मन के निरोध का)
अभ्यासवाला तथा युक्तिमान यानी जिसे अपनी इच्छा के अनुसार उत्क्रमण में (निर्गमन
में), परकायप्रवेश में, अपने अभीष्ट लोक की प्राप्ति के मार्गभूत नाडी द्वारा विशेष प्रकार
से निकलने ओर प्रवेश करने मेँ निपुणताका अभ्यास हो गया हो । उनमें विचला धारणानिष्ठ
पुरुष क्रम से युक्ति का अभ्यास कर देह का त्याग कर देह के अन्त में सुखपूर्वक जाता हे,
युक्तिमान् पुरुष वैसा ही रहकर सुख को प्राप्त होता है ओर जिस पुरुष को न तो धारणा
का अभ्यास है ओर न युक्ति ही उसके पास है, ऐसा मूर्ख पुरुष विवश होकर दुःख को ही
प्राप्त होता है