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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 23–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 23-25

संस्कृत श्लोक

गृहीतव्योमसंवित्तिचिद्व्योम व्योमतां गतम् । गृहीतकालतासंविच्चिन्नभः कालतां गतम् ॥ २३ ॥ गृहीतजलसंवित्तिचिद्व्योम वारिवत्स्थितम् । स्वप्ने यथा हि पुरुषः पश्यत्यात्मनि वारिताम् ॥ २४ ॥ स्वप्नचित्संविदाभाति भवत्येषा यथास्थिता । चिच्चमत्कारचातुर्यादसदेतत्समूहते ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ को ही उदाहरण देकर दर्शाती है । सृष्टि के आरम्भ में चिदाकाश, जिसने आकाशरूप से स्फुरण को स्वीकार किया था, आकाशरूपता को प्राप्त हुआ, कालरूप से स्फुरणका स्वीकार कर चिदाकाश ही कालरूपता को प्राप्त हुआ, जलरूप से स्फुरण का स्वीकार कर चिदाकाश ही ऐसे जल के रूप में स्थित हुआ जैसे कि स्वप्न में पुरुष अपने में ही जलत्व को देखता हे । स्वप्न की नाई चिति ही तत्‌- तत्‌ रूप को प्राप्त हुई है । तत्‌ -तत्‌ रुप को प्राप्त होने पर भी वह ज्यों-की-त्यों बनी रहती है यानी अपने स्वरूप से च्युत नहीं होती, क्योकि चित्‌ के चमत्कार की यानी माया के चातुर्य से यह प्रपंच असत्य होता हुआ ही अपने में सत्यता की बुद्धि उत्पन्न कराता है