Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
क्वचिदावृतिमत्सौम्यं क्वचिन्नद्यां जलं यथा ।
क्वचित्सौम्यं क्वचिज्जीवधर्मेदं चेतनं तथा ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
सांसारिक जीव के संवित् प्रवाह का वर्णन करते हैं ।
जैसे नदी में जल कभी आवर्तयुक्त यानी अस्थिर अतएव मेला होता है और कभी स्थिर
अतएव निर्मल हो जाता है, वैसे ही यह चेतन (सांसारिक जीव) भी कभी सौम्य (निर्मल) ओर
कभी राग द्वेष आदि से कलुषित हो जाता है