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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 41–50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verses 41–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 41-50

संस्कृत श्लोक

परमान्ध्यमनालोको दिवाप्युदिततारकः । साभ्रदिग्मण्डलाभोगो घनमेचकिताम्बरः ॥ ४१ ॥ मर्मव्यथाविच्छुरितः प्रभ्रमदृष्टिमण्डलः । आकाशीभूतवसुधो वसुधाभूतखान्तरः ॥ ४२ ॥ परिवृत्तककुप्चक्र उह्यमान इवार्णवे । नीयमान इवाकाशे घननिद्रोन्मुखाशयः ॥ ४३ ॥ अन्धकूप इवापन्नः शिलान्तरिव योजितः । स्वयं जडीभवद्वर्णो विनिकृत्त इवाशये ॥ ४४ ॥ पततीव नभोमार्गात्तृणावर्त इवार्पितः । रथे द्रुत इवारूढो हिँमवद्गलनोन्मुखः ॥ ४५ ॥ व्याकुर्वन्निव संसारं बान्धवानस्पृशन्निव । भ्रमितक्षेपणेनेव वातयन्त्र इवास्थितः ॥ ४६ ॥ भ्रमितो वा भ्रम इव कृष्टो रसनयेव वा । भ्रमन्निव जलावर्ते शस्त्रयन्त्र इवार्पितः ॥ ४७ ॥ प्रोह्यमानस्तृणमिव वहत्पर्जन्यमारुते । आरुह्य वारिपूरेण निपतन्निव चार्णवे ॥ ४८ ॥ अनन्तगगने श्वभ्रे चक्रावर्ते पतन्निव । अब्धिरुर्वीविपर्यासदशामनुभवन्स्थितः ॥ ४९ ॥ पतन्निवानवरतं प्रोत्पतन्निव चाभितः । सूत्काराकर्णनोद्भ्रान्तपूर्णसर्वेन्द्रियव्रणः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

वह परम अन्धकार को प्राप्त होकर प्रकाश से वंचित रहता है, क्योकि दिन में उसके लिए तारे उगे रहते हैं, उसका आकाश अत्यन्त तिमिराच्छन्न रहता हे, उसके चारों ओर दसों दिशाओं में मेच व्याप्त रहते हैं, मर्मपीडा से वह व्याप्त रहता है,उसकी दुष्ट चक्कर खाती रहती है, पृथिवी उसके लिए आकाश बन जाती है, आकाश पृथिवी बन जाता है, दिशाएँ उसे घूमती हुई प्रतीत होती हैं, समुद्र में बहाया जाता हुआ-सा, आकाशमें ले जाया जाता हुआ-सा, अंधे कुएँ मेँ गिरा हुआ-सा, शिला के अन्दर घुसाया-हुआ-सा, प्रबल निद्रा को प्राप्त होता हुआ-सा पराधीन रहता है । अपने दुःखों को कहने की इच्छा होने पर भी वाणी का स्तम्भ हो जाने से उसके मुँह से अक्षर नहीं निकलते, वह हृदयमें काटा हुआ-सा, आकाशमार्ग से गिरता हुआ-सा, प्रबल आँधी मेँ डाला हुआ-सा, तेज दौडनेवाले रथमें बैठा हुआ-सा, हिमशिला की नाई गलता हुआ-सा, अपने को उदाहरण बनाकर लोगों मेँ संसार-दु-ख का व्याख्यान करता हुआ-सा, पत्थर को फेंकने के यन्त्र से घुमाया हुआ-सा, वायुयन्त्र मेँ रक्खा हुआ-सा, भ्रमियन्त्र (चरखी आदि) में घुमाया हुआ- सा, रस्सीसे खींचा हुआ-सा, जल की भौरी में घूमता हुआ सा, शस्त्रयन्त्र (आरे आदि में या अन्य प्रकार की काटने की मशीन) में रखा हुआ-सा, तृष्णाकी नाई जलाया जाता हुआ-सा, बह रहे पर्जन्यवायु में बैठकर जलप्रवाह के साथ समुद्र मेँ गिरता हुआ-सा, चक्रआवर्तरूप असीम आकाशरूप छिद्र में गिरता हुआ-सा, पृथिवीकी विपर्यसि दशा का अनुभव करता हुआ-सा स्थित होता हे । निरन्तर चारों ओर से नीचे गिरते हुए ओर ऊपर उछलते हुए समुद्र की नाई अस्थिर रहता हे, निःश्वास के शब्द के श्रवण से उसके सब इन्द्रियरूपी व्रण उद्भ्रान्त हो जाते हँ