Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
महाप्रलयसंपत्तौ सर्वार्थास्तमये सति ।
अनन्ताकाशमाशान्तं सद्ब्रह्मैवावतिष्ठते ॥ ९ ॥
तच्चिद्रूपतया तेजःकणोऽहमिति चेतति ।
स्वप्ने संविद्यथा हि त्वमाकाशगमनादि च ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सभी जगह ऐसा ही नियम होता, यदि जगत केवल सत्य स्वभाव होता ओर सभी जगह
अनियम ही होता, यदि जगत असत्य (मायामात्र स्वभाव) होता कितु जगत की सत्य ओर
असत्य से सम्मिलित माया प्रकृत है, इसलिए नियम भी सत्य ओर असत्य स्वभाव होकर
भोगकर्ता के अद्रष्ट के अनुरूप चित्- विवर्त की व्यवस्था से रहते हैं, ऐसा समाधान करने की
इच्छावाली देवीजी उसके लिए शुद्ध चित् के विवर्त का क्रम कहती है ।
श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, महाप्रलय होने पर, जब कि सब पदार्थो का विनाश हो जाता हे,
अनन्त चिदाकाशरूपी शान्त सत् बुद्धरूप ब्रह्म ही केवल रहता है । पर वह जैसे स्वप्न में
अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य सर्पता तथा आकाशगमन आदिका अनुभव करता हे, वैसे ही
चिद्रूप होने के कारण मैं तेज का कण (शुद्ध चित् से व्याप्त होने के कारण चमकदार सूक्ष्म
भूत) हूँ, ऐसा समझता है