Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 67
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
न जायते न म्रियते चेतनः पुरुषः क्वचित् ।
स्वप्नसंभ्रमवद्भ्रान्तमेतत्पश्यति केवलम् ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऊपर
जिसका वर्णन किया हे, वह सब भ्रान्तदुष्टि है, परमार्थदृष्टि तो यह है कि चेतन पुरुष न तो
कभी जन्म लेता है ओर न कभी मरता है, क्योंकि श्रुति ने कहा है- “न जायते प्रियते वा
विपश्चित्" (परमार्थदर्शी न तो जन्म लेता है ओर न मरता है) भ्रान्त पुरूष ही स्वप्नकाल के
भ्रम के तुल्य इसे (जन्म, मरण आदि को) देखता है