Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मरणानन्तरं कर्मफलानुभवनक्रमम् ।
सर्वसंदेहशान्त्यर्थं मृतिश्रेयस्करं श्रृणु ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अन्य नियमो की व्यवस्था करके जीवननियति भी कर्मो के भेद से नियत
अवधिवाली ही इश्वर के संकल्प से रची गई है, इसलिए मरने के पश्चात उसका भग नहीं होता
है, यह दिखलाने के लिए कर्मफ़लो के अनुभवक्रम का निरूपण करने के लिए प्रतिज्ञा करती है ।
मरण के बाद (मरने तक जिनका फल प्रारब्ध हे, उन कर्मो के प्रतिबन्धक होने के कारण
उस देह के संचित कर्म फल देने में समर्थ नहीं होते, मरने पर प्रतिबन्धक के हट जानेसे वे फल
उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं, यह सूचित करने के लिए "मरणानन्तर' कहा गया है) कर्मफलं
के अनुभव का क्रम सुनो, इसके सुनने से तुम्हारे सब सन्देह मिट जायेंगे और तुम्हारे मुँह से
लोक में प्रसिद्ध होकर यह और लोगोमें आस्तिक बुद्धि उत्पन्न करके मरने पर उनके लिए भी
कल्याणकारी सिद्ध होगा