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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 113

45 verse-groups

  1. Verses 1–3अविद्या विवेकविज्ञानहीन पुरुषों में परमार्थ सत्य के समान दृढ़तररूप से विद्यमान हे, किन्तु…
  2. Verse 4यहाँ पर तत्त्व के (अद्वितीय ब्रह्म के) सिवा न कोई भाव पदार्थ है और न अभाव हे । जैसे विशाल…
  3. Verse 5ये भाव और अभाव पदार्थ असन्मय हैं । अपने संकल्प के सिवा इनका दूसरा रूप नहीं हें । इनका आप…
  4. Verse 6बन्धन की जड़ कर्तुत्वाभिमान है, इसलिए पहले उसी का त्याग कीजिये, ऐसा कहते हैं । हे श्रीराम…
  5. Verse 7हे ज्ञानियो में श्रेष्ठ श्रीरामजी, 'मैं अकर्ता हूँ" ऐसा अभिमान भी आप मत कीजिये । अकर्तृत्…
  6. Verse 8हे रघुवर, अभिमान का अभाव होने पर कर्ता होते हुए भी आप उसमें आसक्त न होने के कारण अकर्ता भ…
  7. Verses 9–10क्रिया के फल के मिथ्या होने से कर्म में आसक्ति ही युक्त नहीं है, यों तर्क से भी दृढ़ करते…
  8. Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, जो यह संसार की बीजकणिका अविद्या है, वह यद्यपि विद्यमान नहीं है तथापि…
  9. Verse 12जो यह कृत्रिम वेषवाली सारविहीन संसाररूप घट-शरावों को उत्पन्न करनेवाली चक्रिका (कुम्हार की…
  10. Verses 13–15वह सुन्दर बाँस की लता के समान भीतर में पोली है यानी उसके अन्दर का हिस्सा असार है । नदी की…
  11. Verse 16जिस प्रस्तुत चक्रिका के प्रसाद से उत्पन्न हुए सब पदार्थ कहीं पर टेढ़े है, कहीं पर साफ हैं…
  12. Verse 17यद्यपि यह भीतर से पोली (निस्सार) है तथापि सार से सुन्दर सी लगती है । यद्यपि वह कहीं पर भी…
  13. Verse 18वह यद्यपि जड ही है तथापि मन की चंचलता को धारण करती हुई चैतन्यमयी (चेतन) सी प्रतीत होती ह…
  14. Verse 19सत्त्वगुण से अग्नि की ज्वाला के समान शुद्ध वर्णवाली होने पर भी वह तमोगुण से स्याही के समा…
  15. Verses 20–22निर्मल आत्मप्रकाश मेँ प्रकाश की आवरक होने के कारण वह मलिन हो जाती है ओर अन्धकार में भी वि…
  16. Verses 23–24जैसे जल की आशा से बिजली मेघ में रहती है वैसे ही बिजली के तुल्य चंचल उसने जड़ आशा से अपनी…
  17. Verses 25–28यह अकाल में उत्पन्न हुए फूलों की माला के समान बिना किसी प्रयत्न और प्रार्थना के ही प्राप्…
  18. Verses 29–30कान्तारूपी विभव से शोभित होने वाले विरही पुरुषों की एक रात इसी के प्रभाव से एक वर्ष सी लम…
  19. Verse 31जिसके प्रसाद से, एकमात्र भरम ही जिनका स्वभाव है, ऐसे पुरूषों मेँ सुखी पुरुष को समय अल्प म…
  20. Verses 32–33इसकी वास्तव में कर्तृता क्यो नहीं है यदि ऐसी कोई जिज्ञासा करे, तो उसमें कर्तृत्व की योग्य…
  21. Verses 34–35जैसे अरण्य में मृगतृष्णा मिथ्या ही स्वरूपाडम्बर से युक्त हे, वास्तव में कुछ नहीं हे, वैसे…
  22. Verses 36–39भयंकर आकृतिवाली, रजोगुण के आधिक्य से धूसरवर्णवाली तथा जिसने हठात्‌ अपने से भुवनमध्य को आक…
  23. Verse 40इसने परमात्मा को गर्भ मेँ कर रक्खा है यानी आवृत कर रक्खा है, अतएव शरीर में लगने से दाह ओर…
  24. Verse 41बुझी हुई दीपक की लौके समान बाधित हुई यह न मालुम कहाँ चली जाती है । भाव यह कि बाधित पदार्थ…
  25. Verses 42–43जैसे बिखेर कर देखी गई परमाणुओं की धूलिमुष्टि कुछ भी प्रतीत नहीं होती, वैसे ही यह भी कुछ भ…
  26. Verses 44–45द्विचन्द्र के भ्रम के समान यह उत्पन्न हुई है, स्वप्न के समान विविध भ्रम उत्पन्न करती है,…
  27. Verse 46इसके द्वारा आत्मा के दूषित होने पर यानी आवरण द्वारा असत्प्राय किये जाने पर मन में भाँति-भ…
  28. Verse 47विषयरूप रथ पर बैठी हुई यानी विषयाकार बनी हुई उद्भूतवासनारूप महाबलवती यह अविद्या, जैसे जाल…
  29. Verse 48यह अविद्या ही माता और पत्नी का रूप भी धारण करती है, ऐसा कहते हैं। यह अविद्या कृपा से अश्र…
  30. Verse 49चाँदनी के रूप में परिवर्तित अमृत बिन्दुओं से जिसने तीनों लोकों को तृप्त किया है, ऐसे अमृत…
  31. Verse 50अन्ध बनानेवाली इस अविद्या से वाणी आदि सब कर्मेन्द्रियों से रहित स्थाणु (हठ) भी उन्मत्त शब…
  32. Verse 51इसीके प्रताप से सन्ध्या आदि कालों में ढेले, पत्थर ओर भीत साँप, अजगर आदि की भ्रान्ति से दे…
  33. Verses 52–53इसीके प्रताप से जैसे दो चन्द्रमाओं का दर्शनरूप भ्रम होने पर एक चन्द्रमा दो रूप से दिखाई द…
  34. Verses 54–55हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसका यह उद्धत अविद्या निर्माण न करती हो । यद्…
  35. Verse 56इस प्रकार आश्चर्यसागर में डाले गये श्रीरामचन्द्रजी अविद्या के स्वरूप का पर्यालोचन करने से…
  36. Verse 57इसका न कोई लाल, पीला, हरा आदि रूप है ओर न कोई आकार है, सुन्दर चैतन्य से भी यह हीन है, यह…
  37. Verse 58यह आलोक से (आत्मप्रकाश से) नष्ट हो जाती है ओर अन्धकार के मध्य में खूब चमकती हे, अतएव यह उ…
  38. Verse 59एकमात्र क्रियाशक्ति की यह आश्रय है, अतएव केवल कुत्सित कर्म करती है, भगवत्तत्त्वसाक्षात्का…
  39. Verse 60जैसे पामर की स्त्री अत्यन्त दीन-हीन आचार ओर धर्मवाली ओर नित्य अन्धकार से (अज्ञान से) ढकी…
  40. Verse 61सदा अनन्त दुःखों से आकुल मृत के तुल्य अतः संज्ञाहीन इसने इस जगत्‌ को अन्धा बना रक्खा हे
  41. Verse 62इस अविद्या के काम ओर कोप ही सुदृढ अंग है, तमोगुण की अधिकता से यह बड़ी क्रूर है, ज्ञान का…
  42. Verses 63–64आत्मा के विषय में जो अन्धरूप मूढ है, वे ही इसके आश्रय हैं, यह जड है, अपनी जडता से जीर्णशी…
  43. Verse 65जो पुरुष के साक्षात्कार को तनिक भी सहने के लिए समर्थ नहीं है, उस आवरण करनेवाली अविद्यारूप…
  44. Verse 66न जिसमें चेतना ही है और जो नष्ट न होने पर भी नाश को प्राप्त होती है, उस कर्कश स्त्रीरूपी…
  45. Verse 67पूर्व वर्णित वासनामयी अविद्या का उपसंहार कर रहे श्रीरामचन्द्रजी अविद्या के उच्छेद का उपाय…