Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
उन्मत्तरववेतालनर्तनारम्भसंभ्रमम् ।
स्थाणवः संप्रयच्छन्ति मूका अप्येतयान्धया ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
अन्ध बनानेवाली
इस अविद्या से वाणी आदि सब कर्मेन्द्रियों से रहित स्थाणु (हठ) भी उन्मत्त शब्दवाले वेतालों
के नाचने, कूदने आदि का भ्रम उत्पन्न करते हैं