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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 36–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

अटत्युड्डामराकारा रजःप्रसरधूसरा । बलात्कल्पान्तवात्येव स्वाक्रान्तभुवनान्तरा ॥ ३६ ॥ धूमालीवाङ्गसंलग्ना दाहखेदप्रदायिनी । गर्भीकृतरसाक्रम्य जगन्ति परिवर्तते ॥ ३७ ॥ धारा जलधरस्येव सुदीर्घा जलनिर्मिता । असारसंसारदृढा रज्जुस्तृणगणैरिव ॥ ३८ ॥ तरङ्गोत्पलमालेव कल्पनामात्रवर्णिता । मृणालीव बहुच्छिद्रा पङ्कप्रौढा जलात्मिका ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

भयंकर आकृतिवाली, रजोगुण के आधिक्य से धूसरवर्णवाली तथा जिसने हठात्‌ अपने से भुवनमध्य को आक्रान्त किया है, ऐसी यह प्रलयकाल के बवंडर के समान है । बवंडर की भी आकृति भीषण होती है, धूलि से वह धूसर होता है ओर जबरदस्ती भुवनमध्य को आक्रान्त कर लेता है