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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

अरूपया निराकृत्या चारुचेतनहीनया । असत्येवाप्यनश्यन्त्या चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसका न कोई लाल, पीला, हरा आदि रूप है ओर न कोई आकार है, सुन्दर चैतन्य से भी यह हीन है, यह असत्‌ है तथापि मृगतृष्णा की नदी के समान यह नष्ट नहीं होती । इस निगोडी ने सारे जगत्‌ को अन्धा कर रक्खा है, यह बड़े आश्चर्य की बात है