Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
आलोके विमले म्लाना तमस्यपि विराजते ।
मृगतृष्णेव शुष्काभा नानावर्णविलासिनी ॥ २० ॥
वक्रा विषमयी तन्वी मृद्वी संकटकर्कशा ।
ललनाचञ्चला लुब्धा तृष्णा कृष्णेव भोगिनी ॥ २१ ॥
स्वयं दीपशिखेवाशु क्षीयते स्नेहसंक्षये ।
सिन्दूरधूलिलेखेव विना रागं विराजते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्मल आत्मप्रकाश मेँ प्रकाश की आवरक
होने के कारण वह मलिन हो जाती है ओर अन्धकार में भी विराजमान रहती है । यद्यपि
मृगतृष्णा के समान शुष्क कान्तिवाली है, तथापि विविध वर्णो से विलसित होती है । वह
काली-सौँपिन के समान टेढी, विष से भरी हुई, दुबली-पतली, बड़ी कोमल, दुःख की हेतु
होने से अत्यन्त कर्कश, नारी के समान चंचल, तृष्णा के समान लोलुप है । स्नेह का विनाश
होने पर दीपक की लौ से समान अपने-आप शीघ्र नष्ट हो जाती हे, स्नेह के बिना भी
सिन्दूर की बुकनी की रेखा के समान रागवती होकर विराजमान होती हे