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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

अस्याः स्वसत्तामात्रेण कर्तृतैतासु वृत्तिषु । दीपस्यालोककार्याणां यथा तद्वन्न वस्तुतः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसके प्रसाद से, एकमात्र भरम ही जिनका स्वभाव है, ऐसे पुरूषों मेँ सुखी पुरुष को समय अल्प मालूम होता है ओर दुःखी पुरुष को दीर्घं प्रतीत होता है ॥ ३ ०॥ जैसे प्रकाश के कार्यों में दीपक की अपने संनिधानमात्रसे कर्तृता है, वैसे ही उसकी अपनी केवल सत्ता से ही इन वृत्तियों में कर्तृता है, वस्तुतः कर्तृता नहीं हे