Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
नष्टा दीपशिखेवैषा न जाने क्वेव गच्छति ।
मिहिकेवाग्रदृष्टापि गृह्यमाणा न किंचन ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
बुझी हुई दीपक की लौके
समान बाधित हुई यह न मालुम कहाँ चली जाती है । भाव यह कि बाधित पदार्थ के स्वरूप का
एक दो की तो बात ही क्या हजारों वादी भी यदि चाहें तो, निरूपण नहीं कर सकते हैं । तुषार
से निकलती हुई धूपपंक्ति के समान आगे से दिखाई देती है, पर पकड़ने पर कुछ भी हाथ नहीं
आती