Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 59
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
कुकर्मैकान्तकारिण्या न सहन्त्या विलोकनम् ।
देहमप्यविजानन्त्या चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
एकमात्र क्रियाशक्ति की यह आश्रय है, अतएव केवल कुत्सित कर्म करती है,
भगवत्तत्त्वसाक्षात्कार को तो यह फूटी आँख से भी नहीं देख सकती है ओर ज्ञानशक्तिशून्य
होने के कारण अपनी देह को भी नहीं जानती हे । इसने सम्पूर्ण जगत् को अन्धा बना डाला हे,
यह आश्चर्य हे