Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
मनोज्ञमपि सत्यं च दृश्यते सदसत्तया ।
अमनोज्ञमसत्यं च दृश्यते सत्तयाप्यसत् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके द्वारा आत्मा के दूषित होने पर यानी आवरण द्वारा
असत्प्राय किये जाने पर मन में भाँति-भाँति की भ्रान्तियाँ, समुद्र के तरंगों की नाई, उत्पन्न
होती हैं और नष्ट होती हैं ॥४५।॥| मनोहर और सत्य ब्रह्म को वह असत्रूप से (जगत्रूप से)
देखती है, अमनोहर ओर असत् जगत् को सत्रूसे (ब्रह्मरूप से) देखती है