Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
क्षणप्रकाशतरला कृतसंस्था जडाशया ।
मुग्धानां त्रासजननी वक्रा विद्युदिवोदिता ॥ २३ ॥
यत्नाद्गृहीत्वा दहति भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
लभ्यतेऽपि हि नान्विष्टा विद्युद्वदतिभङ्गुरा ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
जल की आशा से बिजली मेघ में रहती है वैसे ही बिजली के तुल्य चंचल उसने जड़ आशा
से अपनी स्थिति कर रक्खी है । वह मूढ लोगों में त्रास पैदा करनेवाली टेढी बिजली के
समान उदित हुई है । बिजली के समान अत्यन्त भंगुर वह बड़े यत्न से पकड़कर जलाती
है यानी सन्ताप दुःख में डालती है, हो होकर लीन हो जाती है और खोजने पर भी नहीं
मिलती है