Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 25–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 25–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 25-28
संस्कृत श्लोक
अप्रार्थितैवोपनता रमणीयाप्यनर्थदा ।
अकालपुष्पमालेव श्रेयसेनाभिनन्दिता ॥ २५ ॥
अत्यन्तविस्मृतैवातिसुखाय भ्रमदायिनी ।
दुःस्वप्नकलनेवेयमनर्थायैव तर्किता ॥ २६ ॥
प्रतिभासवशादेषा त्रिजगन्ति महान्ति च ।
मुहूर्तमात्रेणोत्पाद्य धत्ते ग्रासीकरोति च ॥ २७ ॥
मुहूर्तो वत्सरश्रेणी लवणस्यानया कृता ।
रात्रिर्द्वादशवर्षाणि हरिश्चन्द्रस्य निर्मिता ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अकाल में उत्पन्न हुए फूलों की माला के समान बिना किसी
प्रयत्न और प्रार्थना के ही प्राप्त हुई है, देखने में मनोहर होती हुई भी बड़े-बड़े अनर्थो को
देती है और मोक्षरूप कल्याण के लिए अभिनन्दित नहीं है यानी कल्याण में बाधा पहुँचाती
हे । विविध भ्रम उत्पन्न करनेवाली यह जब अत्यन्त विस्मृत होती है, तभी अति सुख प्राप्त
होता है । कल्पना द्वारा जब पुनः पुनः इसका अनुसन्धान किया जाता है तब दुःस्वप्नो की
कल्पना के समान यह अनर्थदायिनी ही होती है । यह प्रतिभास से बड़े-बड़े तीनों जगतां
को एक मुहूर्त मेँ उत्पन्न कर धारण करती है ओर संहार कर डालती है । इसने राजा लवण
के एक मुहूर्त को अनेक वर्ष बना डाला ओर राजा हरिश्चन्द्र की एक रात को बारह वर्ष कर
दिया