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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 34–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

अरण्ये मृगतृष्णेव मिथ्यैवाडम्बरान्विता । विडम्बयति तान्मुग्धमृगानेव न मानुषान् ॥ ३४ ॥ फेनमालेव संजातध्वस्ता विच्छेदवर्जिता । जडेव चञ्चलाकारा गृह्यमाणा न किंचन ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अरण्य में मृगतृष्णा मिथ्या ही स्वरूपाडम्बर से युक्त हे, वास्तव में कुछ नहीं हे, वैसे ही यह मिथ्या स्वरूपाडम्बर से युक्त है और उन्हीं भोले-भाले मृगों को यह ठगती है, मनुष्यों को नहीं ठगती जैसे मृगतृष्णा मृगो को ही ठगती है, मनुष्यों को नहीं ठगती वैसे ही यह भी मृगो की नाई अज्ञ जीवों को ही ठगती है, ज्ञानी पुरुषों को नहीं ठगती है यह जल की फेनराशि के समान उत्पन्न होते ही नष्ट होनेवाली है ओर प्रवाहरूप से नित्य हे । पाले के समान चंचल आकारवाली है । इसे पकड़ने जाओ, तो कुछ भी हाथ नहीं लगता