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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 52–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 52–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 52,53

संस्कृत श्लोक

एकोऽपि द्वितयोदेति यथा द्विशशिदर्शने । दूरमभ्याशतां याति स्वप्ने स्वमरणं यथा ॥ ५२ ॥ आदीर्घं क्षणतामेति कालस्येष्टा यथा निशा । क्षणो वर्षमिवाभाति कान्ताविरहिणामिव ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीके प्रताप से जैसे दो चन्द्रमाओं का दर्शनरूप भ्रम होने पर एक चन्द्रमा दो रूप से दिखाई देता है, वैसे ही एक ही वस्तु दो रूपों को प्राप्त होती है, जैसे स्वप्न में अपना मरण दूर होता हुआ भी समीप में प्राप्त होता है, वैसे ही दूर की वस्तु नजदीक में आ जाती है, जैसे संहाररुद्रकी अभीष्ट प्रलयरात्रि दीर्घ होती हुई भी क्षणरूप में परिवर्तित हो जाती है वैसे ही दीर्घ काल क्षणता को प्राप्त होता है, जैसे प्रिया के विरह से दुःखी पुरूषों का एक क्षण वर्ष की तरह प्रतीत होता है वैसे ही एक क्षण वर्ष-सा मालूम होता है