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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 13–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

चारुवंशलतेवान्तःशून्या निस्सारकोटरा । सरित्तरङ्गमालेव न व्युच्छिन्नापि नश्वरी ॥ १३ ॥ गृह्यमाणापि हस्तेन ग्रहीतुं नैव युज्यते । मृद्वप्यत्यन्ततीक्ष्णाग्रा निर्झरोर्मिरिवोत्थिता ॥ १४ ॥ दृश्यते प्रकराभासा सदर्थे नोपयुज्यते । तरङ्गिण्यतरङ्गाभा स्वाकारपरिनिष्ठिता ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

वह सुन्दर बाँस की लता के समान भीतर में पोली है यानी उसके अन्दर का हिस्सा असार है । नदी की लहरों की परम्परा के तुल्य यदि वह भली भाँति काटी भी जाय, तो भी नष्ट नहीं होती है । वह हाथ से ग्रहण करनेपर भी ग्रहण नहीं की जा सकती, अत्यन्त कोमल होती हुई भी झरने के प्रवाह के समान उसका अग्रभाग अत्यन्त तीखा है (झरने का प्रवाह तटवृक्ष का छेदन करने के कारण तीक्ष्णाग्र होता है) । यद्यपि वह कार्य करने में समर्थ कारणकलाप के तुल्य प्रतीत होती है तथापि सत्य पुरुषार्थ में उसका कोई उपयोग नहीं होता । सत्य तरंगों से शून्य स्वप्न की तरंगिणी के सदृश, मृगतृष्णा की नदी के तुल्य प्रतीति मात्र से शोभायमान वह आकार में ही परिनिष्ठित है, अर्थक्रिया में परिनिष्ठित नहीं हे