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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 62

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

कामकोपघनाङ्गिन्या तमःप्रसरवक्रया । अचिरेणाशरीरिण्या चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस अविद्या के काम ओर कोप ही सुदृढ अंग है, तमोगुण की अधिकता से यह बड़ी क्रूर है, ज्ञान का उदय होने पर यह शीघ्र ही शरीररहित हो जाती है, अतएव यह काम ओर कोप से सुघन अंगवाली, अंधेरे की अधिकता होने से अतिक्रूर, मरने पर तुरन्त शरीर रहित होने वाली किसी निशाचरी दीनहीन नारी के तुल्य हे । बड़े अचम्भे की बात है कि इसने जगत्‌ को अन्धा बना रक्खा है