Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अविद्यमानयैवेदं पेलवांग्या सुतुच्छया ।
मिथ्याभावनया नाम चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार आश्चर्यसागर में डाले गये श्रीरामचन्द्रजी अविद्या के स्वरूप का पर्यालोचन
करने से विस्मित होकर उसका वर्णन करते हुए अपने विस्मय को प्रकट करते है।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, यह अविद्या अविद्यमान (असत्) है, अतिसुकुमार
अंगवाली है, अत्यन्त तुच्छ हे यानी वास्तविकता तो इसे छू तक नहीं गई ओर मिथ्या भावनारूप
है । इस बला ने सारे जगत् को अन्धा बना रक्खा है, यह कम आश्चर्य की बात नहीं है