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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

मा वाऽकर्ता भव प्राज्ञ किमकर्तृतयेहिते । साध्यं साध्यमुपादेयं तस्मात्स्वस्थो भवानघ ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ज्ञानियो में श्रेष्ठ श्रीरामजी, 'मैं अकर्ता हूँ" ऐसा अभिमान भी आप मत कीजिये । अकर्तृत्वरूप से अभिमान करने पर प्राप्त होने योग्य अपने यत्न से साध्य क्या फल है ? अर्थात्‌ कुछ भी नहीं हे, अतएव अकर्तृत्वाभिमान भी व्यर्थ है, यह भाव है इसलिए हे निष्पाप, आप अभिमान से रहित होकर स्वस्थ होइये