Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
जडैव चिन्मयीवासावन्यस्पन्दोपजीविनी ।
निमेषमप्यतिष्ठन्ती स्थैर्याशङ्कां प्रयच्छति ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह यद्यपि जड ही है तथापि मन की चंचलता को
धारण करती हुई चैतन्यमयी (चेतन) सी प्रतीत होती ह । यद्यपि एक पलकभर भी वह कहीं
स्थिर नहीं होती, तथापि अपने में स्थिरता की आशंका पैदा करती है