Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 110
एक सौ नौवाँ सर्ग समाप्त एक सौ दसवाँ सर्ग॑ मन के वैभव के वर्णन द्वारा मन के शमन के उपाय का वर्णन |
46 verse-groups
- Verse 1मन वासनामय है, अतएव वासनाओं का आत्यन्तिक उच्छेद ही मन के शमन का उपाय है । वासना के आत्यन्…
- Verse 2श्लोकस्थ "आदौ से यह सूचित होता है कि जब चित् के प्राथमिक चेत्यपदपात अज्ञाननिमित्तक है तव…
- Verse 3इस प्रकार अति तुच्छ वासनारूपी सहत्त्रों दोषों से म्लान हुई मनोवृत्तिरूप से स्थित वह चिति…
- Verse 4जैसे सकलंक असत् मनोवृत्ति चेतन के दुःख की वृद्धि करती है वैसे ही वासनाओं का क्षय हो जाने…
- Verse 5उक्त अर्थ की संभावना से मनकी अघटित घटना शक्ति को कहते हैं। मन दूर को समीप बना देता है और…
- Verse 6जैसे भ्रान्त पथिक को दूर से स्थाणु भी पिशाच प्रतीत होता है वैसे ही वासनाओं वाले अज्ञानी च…
- Verse 7कलंक से (वासनाओं से) मलिन हुआ मन मित्र में शत्रुत्व की शंका करता हे । देखिये न ! नशे में…
- Verse 8मन के व्याकुल होने पर चन्द्रमा से वज की उत्पत्ति होती हे । अमृत ही क्यों न हो यदि यह विष…
- Verse 9वासनाओं से परिपूर्ण मन गन्धर्वनगर को, जो असत् है, सत् के समान देखता है ओर जाग्रत को स्व…
- Verse 10मन की उत्कट वासना प्राणी के मोह की एकमात्र कारण है । उसी को प्रयत्न के साथ मूलोच्छेदपूर्व…
- Verse 11वासनारूपी जाल से खींचा गया मनुष्यों का मन रूपी हिरन संसाररूपी वन की झाड़ी में अत्यन्त विव…
- Verse 12जिस विचार ने जीव की ज्ञेय पदार्थो की वासना का उच्छेद किया, मेघो के आवरण से रहित सूर्य के…
- Verse 13पहले मन ही मेरी देह है अन्य देह नहीं है, ऐसा सदा अभ्यास करना चाहिए, ऐसा कहते हैं । इसलिए…
- Verses 14–16हे रघुवर, जो मन ने किया, उसी को आप किया हुआ समझिये। हे पुण्यमय जिसका मन ने त्याग किया उसी…
- Verse 17जिसका मन मोह को प्राप्त होता है, वह मूढ कहा जाता है । शरीर के मोह को प्राप्त होने पर शव क…
- Verses 18–19मन जब देखता है चक्षु हो जाता है, जब सुनता है तब श्रोत्रता को प्राप्त होता है, स्पर्श करने…
- Verse 20मन छोटे पदार्थ को बड़ा बना देता है, सत्य पदार्थ मे असत्ता स्थापित कर देता हे । स्वादिष्ट…
- Verse 21जो वृत्तिवर्ती चित्त का प्रतिभास है यानी चैतन्य द्वारा उज्ज्वलित मन की घट, पट आदि विषयाका…
- Verses 22–24प्रतिभास के कारण ही स्वप्न से व्याकुल चित्तवाले हरिश्चन्द्र की एक रात बारह वर्ष की हो गई…
- Verse 25जैसे डोरे के जल जाने पर मोती की माला टूट जाती हे वैसे ही मन के जीत लेने पर सब इन्द्रियाँ…
- Verses 26–28हे श्रीरामचन्द्रजी, मन की इससे बढ़कर पदार्थो की विपरीत कल्पना की सामर्थ्य ओर क्या कही जाय…
- Verse 29यदि किसी को यह शंका हो कि मूढ मन भले ही अन्यथा कल्पना करे परन्तु विचार से जागरूक हुआ मन अ…
- Verse 30तत्त्वज्ञान होने पर मन क्यों नहीं घुमाता है ? इस पर कहते है । जिन्होंने पूर्णता का साक्षा…
- Verses 31–33चित्- शक्ति से प्रस्फुरित मन स्पन्दों में वायुता को प्राप्त होता है, प्रकाशो मेँ प्रकाशत…
- Verse 34मन यदि अन्य स्थान में संलग्न हो, तो खूब चबाये गये स्वादिष्ट भोजन तक का जिह्ला को स्वाद प्…
- Verses 35–36जो वस्तु चित्त द्वारा देखी गई वही दृष्ट है। यदि चित्त ने नहीं देखी, तो सामने स्थित होने प…
- Verses 37–39यद्यपि इन्द्रियों द्वारा आलोचित आकार को धारण करने से मन इन्द्रियों के कारण साकार है और इन…
- Verse 40अतएव उनमें काम आदिका विकार नहीं देखा जाता है, ऐसा कहते हैं। जिसका बालों का जूड़ा सुगन्धित…
- Verses 41–42मन कहीं और जगह में उलझा हो, तो बड़े जतन से कही जा रही कथा भी ऐसे छिन्न-भिन्न हो जाती है…
- Verse 43स्वप्न में मनके उल्लास को प्राप्त होने पर हृदय में ही निर्मित नगर, पर्वत आदि विस्तीर्ण आक…
- Verses 44–45चंचल समुद्र जैसे अपने में लहरों की कतार को फेला देता हे वैसे ही मन स्वप्न में अपने से विक…
- Verse 46जैसे पत्र, लता, पुष्प, फलों की शोभा अंकुर से अतिरिक्त नहीं हे यानी अंकुर से ही उत्पन्न है…
- Verses 47–49जैसे सुवर्ण की प्रतिमा सुवर्णं से भिन्न नहीं हे वैसे ही क्या जागत् और क्या स्वप्न की विव…
- Verse 50जैसे राजा लवण में भ्रमवश चण्डालता स्फुरित हुई थी वैसे ही यह विशाल जगत् मन का स्फुरणरूप ह…
- Verse 51मन जिस किसी का संकल्प करता है शीघ्र वही हो जाता है । इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, स्फुरणरूप…
- Verse 52यह मन विविध नगर, नदी, पर्वत रूपता को प्राप्त होकर देहियों के अन्दरस्थित होकर ही जाग्रत-स्…
- Verses 53–54जैसे भ्रान्ति वश लवण राजा चण्डालता को प्राप्त हुआ था वैसे ही चित्त भ्रमवश देवत्व से दैत्य…
- Verses 55–57मन चिरकाल से अभ्यस्त संकल्प से ही मरता है ओर संकल्प से ही फिर उत्पन्न होता है ओर स्वतः आक…
- Verse 58विस्तृत मनमें, जिसमें मनन द्वारा मूढवासना अत्यन्त मोह को प्राप्त हुई हे, संकल्प से जन्मस्…
- Verse 59यदि कोई शंका करे कि देश, काल और कर्म की विचित्रता से ही युख-दुःख आदि की विचित्रता प्रसिद्…
- Verse 60इसी प्रकार शरीर भी मन के संकल्प के अधीन ही है, ऐसा कहते हैं। मनः शरीर के संकल्प के सफल हो…
- Verse 61जैसे पतिव्रता नारी अपने संकल्प से उदित विविध विस्तृत उमंगों से अन्तःपुरके आँगन में विलास…
- Verses 62–63मन के निग्रह के उपाय को, फल के साथ, दशति हैं। इसलिए जो पुरुष विषयों के अनुसन्धान में मन क…
- Verse 64जैसे स्तम्भनास्त्र से स्तब्ध हुआ शत्रु किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करता है वैसे ही जिसका म…
- Verses 65–66जैसे मन्दराचल के निश्चल होने पर क्षीरसागर शान्त हो जाता है वैसे ही मन के संयम से संसारभ्र…
- Verse 67भोगसंकल्प के विलासों से जो जो मानसिक वृत्तियाँ उदित होती हैं, वे ही संसाररूपी विष वृक्ष क…