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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

चित्तं चलत्कुवलयं वलयन्त एते मूढा महाजडजवे मदमोहमन्दाः । आवर्तवर्तिनि विलूनविशीर्णचिन्ताचक्रभ्रमे पुरुषदुर्भ्रमराः पतन्ति ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

भोगसंकल्प के विलासों से जो जो मानसिक वृत्तियाँ उदित होती हैं, वे ही संसाररूपी विष वृक्ष के अंकुर के बीज है ।। ६६॥ मद और मोह से मन्दमति और मूढ ये पुरुषरूपी दुष्ट भवर चित्तरूपी चंचल कमल को (संसाररूपी दुष्ट नदी से बहाये जा रहे कमल को) घेरकर घूमते हुए महाजड़ता के प्रवाहरूप जलवेग से युक्त, बवंडरके चक्करों से घूमनेवाले, प्रबल दूसरी चिन्ता से कटे हुए और चिरकाल तक निष्फलता प्राप्त होने से देह के साथ नष्ट हुए चिन्तारूपी चक्रभ्रमण में गिरते हैं